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‘एन्साइक्लोपीडिया’ आफ कालसर्पयोग Encyclopedia of Kalsarpyog

₹200.00


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कालसर्पयोग पर डॉ. भोजराज द्विवेदी की पहली पुस्तक 1993 में प्रकाशित हुई। पुस्तक छपते ही ज्योतिष जगत, कर्मकाण्ड व पारौहित्य की दुनिया में हंगामा मच गया। इस पुस्तक के अनेकों संस्करण बिके। साथ ही भारतवर्ष की जगह-जगह कालसर्पयोग शांति के सामुहिक शिविर और पूजन की विशिष्ट परम्परा का श्री गणेश हुआ। लोग चमत्कृत रूप से प्रभावित होने लगे। पुस्तक के संस्करण छपे, लाखों जनमानस ने इसका लाभ उठाया।
इसी बीच हिन्दी, गुजराती, मराठी व अंग्रेजी भाषा में कई छद्म लेखकों ने इस पुस्तक की हूबहू नकल, थोड़ा बहुत उलट-पुलट करके प्रकाशित कर दी। नकली नोट की भांॅति इस पुस्तक की नकली प्रतियां भी बाजार में विक्रित होने लगी। नकली लेखकों के कारण लोगों में कालसर्पयोग के प्रति भ्रांॅतियां बढ़ने लगी। इसी बीच कर्मकाण्ड विरोधी एवं ब्राह्मण विरोधी कुछ नास्तिक ताकतें भी उठ खड़ी हुई। जिन्होंने माना कालसर्पयोग होता ही नहीं। इस विषय पर भी पुस्तकें लिखनी शुरु की, सस्ती लोकप्रियता के लालच में ये लेखक भी पिट गए। कालसर्पयोग का प्रचार-प्रसार द्रुतगति से बढ़ा जिज्ञासु सज्जनों को सही विषय वस्तु की जानकारी अनुभव के आधार पर खरी होती दिखाई दी। कालसर्पयोग इस सहस्त्राब्दी में ज्योतिष जगत का सबसे चर्चित विषय बन गया।
प्रबुद्ध पाठकों के अनेक रोचक-पत्र, कुछ समस्याएं एवं कुछ शंकाएं हमारे पास आई। जिसका समयोचित समाधान प्रस्तुत पुस्तक में किया हैं। कालसर्पयोग की उत्पत्ति एवं प्रभाव शत-प्रतिशत तर्क सम्मत होते हुए भी अनुभूति का विषय अधिक है। जिस प्रकार से ईश्वर के अस्तित्व की पुष्टि के संदर्भ में अनेक तर्क व ऐतिहासिक प्रमाण देने पर भी कुतर्की व नास्तिक लोगों को संतुष्टि नहीं मिलती। क्योंकि ईश्वर की आध्यात्मिक शक्तियांॅ अनुभूति का विषय अधिक है। यह कह देना ‘ईश्वर नहीं हैं’, बहुत आसान है। कोई भी जड़मति, महामूर्ख ऐसा कह सकता है, परन्तु ईश्वर हैं इसे सार्वजनिक रूप से प्रमाणित करना अति दुष्कर कार्य है। कालसर्पयोग के बारे में भी कुछ ऐसी स्थिति कुछ समय पूर्व थी पर अब निरन्तर शोध-अनुसंधान व लगातार होने वाले कालसर्पशान्ति के सामूहिक शिविरों ने जिज्ञासाओं को शांत कर दिया है। इस श्रृंखला में प्रस्तुत पुस्तक सार्वजनिक शोध की महत्त्वपूर्ण कड़ी है।
पुस्तक का सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि फलित ज्योतिष में कालसर्पयोग के बारे में विस्तृत शोध व अनुसंधान का कार्य इसके पहले कभी हुआ नहीं। इस पुस्तक में वर्णित 62208 प्रकार के कालसर्पयोगों के बारे में पहली बार जानकारी प्रबुद्ध पाठकों को मिलेगी। विविध प्रकार के कालसर्पयोगों का विवरण लग्नों के अनुसार विभाजित करके उनका वर्गीकरण किया गया है। प्रत्येक लग्न में कम से कम 60 प्रकार की कुण्डलियां कुल 720 प्रकार के फलादेश एवं उनके उदाहरण दिए गए हैं। इसी कारण इस पुस्तक का नाम ‘एन्साइक्लोपीडिया ऑफ कालसर्प’ कालसर्पयोग का विश्व संग्रह रखा गया है। जो अपने आप में अद्भूत है, अपूर्व है।
कालसर्पयोग के समर्थन में कुछ ऐतिहासिक एवं व्यवहारिक जन्मकुण्डलियां भी दृष्टान्त रूप से प्रस्तुत की गई है। जिसके माध्यम से आप अपना नवीन निष्कर्ष खुद निकाल सकते है। कोई पूर्वाग्रह आप पर थोपा नहीं जा रहा है। इसके पहले जो कालसर्पयोग की पुस्तक प्रकाशित है, उसमें कालसर्पशान्ति कराने की विधि पर ही विशेष प्रकाश डाला गया, जो कर्मकाण्ड व पौरोहित्य कर्म करने वालों के लिए अनमोल पुस्तक है। प्रस्तुत ‘एन्साइक्लोपीडिया’ ज्योतिष विषय पर काम करने वाले सज्जनों के लिए मील का पत्थर साबित होगी। कालसर्पदोष निवृत्ति के सटीक उपाय भी पुस्तक के अंत में दिए गए है। इन उपायों को करने से हजारों-लाखों लोगों को लाभ हुआ है। असम्भव एवं अकल्पनीय रुकावटें दूर हुई है। अनेक भुक्तभोगी जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण हमारे पास मौजूद हैं। क्योंकि प्रत्येक अमावस्या को हमारे यहां होने वाली सामूहिक कालसर्पयोग का पूरा रिकार्ड रखा जाता है। हमारे अनुभव से वर्ष के भीतर-भीतर तीन बार विधि कराने से यह दुर्योग नष्ट होता देखा गया है। कई ऐसे सज्जन भी है, जिन्होंने तीन बार विधि करा दी, संकल्पित कार्य भी हो गया, फिर भी मौका मिलते ही अनुष्ठान-विधि में भाग लेने पहुंच जाते हैं। उनसे पूछा गया तो जवाब देते हैं, हमारे आने वाले संकटों से हमें पहले ही मुक्ति मिल जाती है। हमारे भविष्य का मार्ग निष्कंटक होता है। हमें प्रायश्चित स्नान, यज्ञ-हवन करने से नई आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। उनके इस तर्क के आगे कई बार हम भी निरुत्तरित हो जाते हैं।
एक बात सदैव याद रखें, कालसर्पयोग के शोध की यह शुरुआत है, अंत नहीं। कालसर्पयोग की तरह विषयोग, चाण्डालयोग अनेक वरिष्ट ग्रहजन्य दुर्योगों की भी शान्ति वैदिक रीति में की जाती है। अभी आप जैसे प्रबुद्ध पाठकों के अनेक रोचक अनुभव इस पुस्तक की अगली श्रृंखला में समाविष्ट होंगे। पुस्तक संग्रहणीय व माननीय हैं। पाठक गण चाहे तो 200/- रु. का धनादेश भेज कर पुस्तक प्राप्त कर सकते है।