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pratiyangira Sampurna Prayog

प्रत्यंगिरा प्रयोग Pratiyangira Sampurna Prayog

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प्रत्यंगिरा प्रयोग Pratiyangira Sampurna Prayog

सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, सृष्टिपालक विष्णु, संहारक रुद्र धन की अधिष्ठातृ देवी लक्ष्मी मानी गई है। वैसे ही परकृत्य पीड़ा को नष्ट करने एवं बलवान् शत्रु को परास्त करने वाली देवी का नाम प्रत्यंगिरा है। जब ऋण, रोग, और शत्रु को निष्प्रभावी करने के सभी उपाय, विफल हो जाते हैं। भौतिक संसाधन एवं पुरुषार्थ की सीमाएं भी कुंठित हो जाती है। तब मनुष्य ईश्वर की शरण में, यंत्र-मंत्र व विभिन्न प्रार्थनाओं का सहारा लेता है। ऐसे प्रत्यंगिरा का प्रयोग अमोघ है। परकृत्य पीड़ा, शत्रुकृत्य अभिचार- मारण-मोहन व उच्चाटन, अनिष्ट की आशंकाओं को समूल नष्ट करने में प्रत्यंगिरा का प्रयोग रामबाण औषधि का काम करती है। मेघनाथ (इंद्रजीत) प्रत्यंगिरा का जबरदस्त उपासक था, शत्रु नाश के लिए प्रत्यंगिरा का प्रयोग कर रहा था, इस पर विभिषण ने लक्ष्मण को यह गुप्त सूचना दी की यदि यह प्रयोग सफल हो गया, एवं निर्विघ्न पूरा हो गया तो मेघनाथ को हराना असम्भव ही हो जायेगा। इस पर लक्ष्मण ने प्रत्यंगिरा का यह प्रयोग पूर्ण होने नहीं दिया और पूजा करते हुए मेघनाथ की हत्या कर दी। परंतु यह प्रयोग आज तक अत्यंत गोपनीय रहा है। मेरुतंत्र, मंत्रमहोदधि दशमहाविद्या में इस प्रयोग को सांकेतिक रूप से उद्धत किया गया है। पर सम्पूर्ण प्रयोग का नितांत अभाव कर्मकाण्ड क्षेत्र में बना रहा। यह पहला अवसर है कि पं. रमेश द्विवेदी ने इस ओर ध्यान दिया तथा प्रत्यंगिरा के सम्पूर्ण प्रयोग को संशोधित व परिमार्जित करके प्रबुद्ध पाठकों हेतु सहज सुलभ कराया। आम व खास पाठकों के दैनिक जीवन में संबंधित हम ऐसे उत्कृष्ट साहित्य को प्रकाशित करने में गौरव अनुभव करते हैं।
प्रत्यंगिरा स्तोत्र के नित्य पाठ मात्र से परकृत्य कर्म तो नष्ट होते ही हैं। साथ ही अतिदरिद्री व्यक्ति भी कुबेर तुल्य धनवान हो जाता है। इस पुस्तक में सर्वप्रथम विनियोग, प्रत्यंगिरा का मंत्रोद्धार, करन्यास, हृदयादिन्यास, दिग्बन्धन और जप के लिए प्रत्यंगिरा मंत्र का विशेष उल्लेख किया गया है। प्रत्यंगिरा साधना का विधान, प्रत्यंगिरा देवी की प्राणप्रतिष्ठा के मंत्र, कलशपूजन, यंत्रपूजन, पादुका पूजन, प्रत्यंगिरा सहस्त्रनाम, प्रत्यंगिरा की फलश्रुति पर विशेष प्रकाश डाला गया है। प्रत्यंगिरा प्रयोग नामक इस पुस्तक को पढ़़कर, प्रबुद्ध पाठकों व जिज्ञासु साधकों को कांच की भांति स्पष्ट हो जाता है कि यह विद्या शत्रुओं का नाश करने में, परकृत्य कर्म को नष्ट करने में शीघ्र फलदायी है। पुस्तक में लेखक ने कई रोचक अनुभवों व संस्मरणों के साथ साथ स्वयं के अनुभूत प्रयोग भी दिये गये है। पुस्तक में काफी सामग्री दी गई हैं, प्रत्यंगिरा देवी पर बाजार में यह पहली व एकमात्र पुस्तक हैं। पुस्तक संग्रहणीय व प्रशंसनीय हैं