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शाबर मंत्र Shabar Mantra

₹150.00


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शाबर मंत्र विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय, प्रचलित व सर्वमान्य मंत्र हैं, जो बोलचाल की विभिन्न भाषाओं में विश्व के प्रत्येक भूभाग में प्रचलित हैं । शाबर मंत्र क्या हैं ? शाबर मंत्रों की विशेषता क्या हैं ? इन मंत्रों का प्रचलन कब से प्रारम्भ हुआ ? ऐसे अनेक अनसुलझे प्रश्नों का सही समाधान आपको इस पुस्तक के माध्यम से पहली बार प्राप्त होगा । प्रबुद्ध पाठकों की कई बार शिकायतें आती हैं कि अनेक उपाय करने पर भी मंत्र सिद्ध क्यों नहीं होते ? इस प्रसंग में मंत्रोचोर साधक व गुरुमार शिष्यों की मनोवृत्ति का पटाक्षेप किया गया है। मंत्र साधना में विभिन्न मुद्राओं के महत्त्व पर सचित्र प्रकाश डाला गया है। मंत्र साधना की सफलता में जहां आसन, स्थान, माला व गणवेश का महत्त्व है, वहां दीक्षा का महत्त्व सर्वोपरी है। गुरु के प्रति सच्ची आस्था, भक्ति व दृढ़ता के साथ मंत्र-दीक्षा ही मनुष्य के शरीर का कायाकल्प करती है। दीक्षा से साधना मार्ग प्रशस्त व प्रकाशित होता है। शाबर मंत्रों के प्रणेता भगवान् शंकर हैं। शंकर शबर, किरात व भील का वेश धारण करके भी कठोर तपस्या की थी। पर्वतों में विचरण करने वाली उनकी पत्नी पार्वती ने भी अनेक बार भीलनी का वेश धारण किया था। भगवान् शंकर के ही अंशावतार भी हनुमान जी से सम्बन्धित सभी दोहे-चौपाइयों की गिनती सिद्ध शाबर-मंत्रों में होती है। इसके अलावा जैन सम्प्रदाय में महावीर स्वामी, मुस्लिम सम्प्रदाय में मेमदापीर के नाम से भी कई शाबर मंत्र प्रचलित है। इस पुस्तक में ऐसे अनेक प्रसिद्ध व प्रचलित मंत्रों का संकलन किया गया है। अनेक प्राचीन पांडुलिपियों के अलावा, कल्याण के विशेषांकों एवं अन्य ग्रन्थों से भी सामग्री का संकलन कर, सहायता ली गई है। प्रबुद्ध पाठकों की सुविधा की दृष्टि से प्रस्तुत पुस्तक चार खण्डों में विभाजित हैं । 1. जिज्ञासा खण्ड 2. कतिपय चुनिन्दे शाबर मंत्र 3. नक्षत्र-कल्प 4. हनुमत्साधना पर विशेष सामग्री । जिज्ञासा खण्ड में शाबर मंत्रों के संबंध में सभी जानकारियां दी गई हैं । कतिपय चुनिन्दें शाबर मंत्रों में लगभग पचास से अधिक विविध मंत्रों का प्रयोग बतलाया गया हैं । ‘नक्षत्र कल्प’ में वनौषधियों का नक्षत्र से संबंध पर विभिन्न प्रयोग विशेेष द्रष्टव्य हैं । यह एक प्रकार का तंत्र हैं । विभिन्न नक्षत्रों के सहयोग से औषधियों के गुणधर्म बदल जाते हैं । प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों में ‘माधवीय निदान’ जैसे ग्रन्थों में लिखा हैं कि अमुक वार, अमुक नक्षत्र के दि औषध ग्रहण करने से साधारण औषधियां, दिव्य औषधियों में बदल जाती हैं । मंत्रयुक्त औषधियों में ही चमत्कार होता हैं । शाबर मंत्रों के प्रयोग में व्याकरण व भाष की अशुद्धियों का कोई महत्व नहीं, यहां भाव व आत्मबल की प्रधानता रहती हैं । पुस्तक के चौथे खण्ड में अजेय योद्धा, परम पराक्रमी श्री हनुमान जी की सरलतम उपासना का विशेष प्रकाश डाला गया हैं । श्री हुनमत्स्रनाम स्तोत्र पहली बार प्रकाशित हो रहा हैं । यह प्रयोग अनुभूत हैं । भगवान् श्री राम के द्वारा निर्मित यह प्रयोग गोपनीय भी रहा हैं, जिसको प्रकट करना अनिवार्य हैं । अतः प्रकाशक ने इस स्तोत्र को प्रकाशित कर बड़े पुण्य का कार्य किया हैं ।