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मेरूपृष्ठीय श्रीयंत्र

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वेदों के अनुसार श्री यंत्र में मां लक्ष्मी सहित 33 कोटी देवी-देवता विराजमान है। इसकी पूजा करने और घर में धन संग्रह के स्थान पर रखने से कभी पैसों की कमी नहीं होती और हर मनोकामना पूरी होती है। श्री का अर्थ होता है लक्ष्मी। इस नाम से ही स्पष्ट है कि यह लक्ष्मी माता का यंत्र है।
Meru Pras

माना जाता है कि जिस घर में श्रीयंत्र की श्रद्घाभाव से नियमित पूजा होती है उस घर में निरंतर धन समृद्घि बढ़ती रहती है। इस संदर्भ में मान्यता यह है कि देवी लक्ष्मी ने स्वयं गुरू बृहस्पति से कहा है कि श्रीयंत्र साक्षात् लक्ष्मी का स्वरूप है। श्रीयंत्र की पूजा करें या लक्ष्मी की मतलब एक है। श्रीयंत्र में लक्ष्मी की आत्मा और शक्ति समाहित हैं।

गुरू बृहस्पति से लक्ष्मी ने तब कही थी जब पृथ्वीवासियों से रूठकर लक्ष्मी बैकुण्ठ चली गई थीं। लक्ष्मी के धरती छोड़कर चले जाने से धरती पर आकाल और दरिद्रता का साम्राज्य हो गया था। पाप प्रवृति बढ़ गयी थी। इस स्थिति को देखकर वशिष्ठ मुनि तपस्या में लीन हो गए। विशिष्ठ मुनि की तपस्या देखकर विष्णु भगवान ने देवी लक्ष्मी से पृथ्वी वासियों को क्षम करके उन पर कृपा करने का अनुरोध किया।

लेकिन देवी लक्ष्मी नहीं मानी। तब गुरू बृहस्पति ने वशिष्ठ मुनि से कहा कि अब एक ही उपाय है कि, श्रीयंत्र की स्थापना करके इसकी पूजा की जाए। गुरू बृहस्पति के नेतृत्व में श्री यंत्र का निर्माण शुरू हुआ और धनतेरस के दिन इसकी स्थापना करके विधिवत पूजा होने लगी। देवी लक्ष्मी दीपावली के दिन प्रकट हुई और कहने लगी, श्रीयंत्र की पूजा के कारण मुझे विवश होकर आना पड़ा। अब मैं आप सभी से प्रसन्न हूं, पृथ्वीवासी अब मेरी कृपा से धन समृद्घि प्राप्त कर सकेंगे।

कितना शक्तिशाली श्रीयंत्र
माना जाता है कि सोने का श्री यंत्र हमेशा प्रभावशाली रहता है। जबकि चांदी का श्रीयंत्र ग्यारह साल तक असरकारी होता है। तांबे से बने श्रीयंत्र की शक्ति दो साल बाद समाप्त हो जाती है।मान्यता है कि इससे हर तरह की श्री यानि चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। मेरू पृष्ठीय श्रीयंत्र की न्यौच्छावर राशि 3100/- रु. मात्र है लेकिन दीपावली के पश्चत् अभिमंत्रित मेरू पृष्ठीय श्रीयंत्र साधको को 2100/- रु. मात्र में उपलब्ध होगा।